रत्न किससे बनता है
रत्नविज्ञानी किसी संभावित रत्न को तीन गुणों पर परखते हैं: सुंदरता, दुर्लभता और टिकाऊपन। CIBJO की Gemstone Book भी रत्न की अपनी परिभाषा में यही तीन गिनाती है। सुंदरता में रंग, पारदर्शिता, चमक (luster, यानी सतह का प्रकाश परावर्तित करने का ढंग) और ओपल के प्ले-ऑफ-कलर (play-of-color) जैसे प्रकाशीय प्रभाव आते हैं। दुर्लभता इसलिए मायने रखती है कि टनों में मिलने वाला पदार्थ, चाहे कितना ही आकर्षक हो, ऊँचा दाम कम ही पाता है। GIA टिकाऊपन को तीन हिस्सों में बाँटता है: कठोरता (खरोंच का प्रतिरोध), सुदृढ़ता (toughness, यानी किनारा टूटने और चटकने का प्रतिरोध) और स्थायित्व (रसायन, ताप, नमी और प्रकाश का प्रतिरोध)।
तीनों पर खरे उतरने वाले पत्थर कम हैं। हीरा प्रकृति का सबसे कठोर पदार्थ है, मोह्स पैमाने पर 10, फिर भी कुछ तलों के साथ पड़ी तेज़ चोट उसे चीर सकती है। मोती उसी पैमाने पर 2.5–3 पर और ओपल 5 से 6.5 पर है, यानी तुलना में नरम, और इसीलिए GIA नरम पत्थरों को कभी-कभार पहनने तक सीमित रखने की सलाह देता है। कुछ खनिज केवल संग्राहकों के लिए काटे जाते हैं क्योंकि अंगूठी में वे खरोंच खा जाते या टूट जाते।
यह परिभाषा भौतिक जितनी ही सांस्कृतिक भी है। कोई पदार्थ तब रत्न बनता है जब लोग उसे पहनने, तराशने या उसका व्यापार करने का चुनाव करते हैं, और फ़ैशन, नए भंडार तथा उपचार समय के साथ उस चुनाव को बदलते रहते हैं।